खोए बच्चों के नाम

by Mohan Rana

एक चिठ्ठी मैं लिखना चाहता हूँ खोए बच्चों के नाम
शहतूत की टहनियों से टँगे
छोटे होते जाते हैं उनके कपड़े
फैलती हैं टहनियाँ
घना होता जाता है शहतूत
और सालों में कभी एक बार मैं बूढ़े पेड़ को देखता हूँ
अपनी छाया पर झुके हुए,
तार-तार होते जाते हैं कपड़े
उनकी स्मृतियाँ हवा में मिलती हैं पानी
में घुलती हैं मौसमों में डूबती हैं
महीन होती जाती भूली हुई कविता सी,

मैं लिखना चाहता हूँ अपने बारे में पर
किसी और की कहने लगता हूँ
समकालीन पुराने हो जाते हैं,
एक दिन वे खो जाएँगे
खोए हुए बच्चों की तरह एक दिन
एक दिन खो जाएगा - कई दिनों में कहीं,

एक चिठ्ठी मैं लिखना चाहता हूँ
खोए हुए बच्चों के नाम
खोए हुए बचपन की ओर से

18.8.1995


(सुबह की डाक)

The literal translation of this poem was made by Lucy Rosenstein

The final translated version of the poem is by Bernard O'Donoghue

Comments

No comments have been made on this poem yet! Why don’t you start us off?