Poems

तीसरा पहर

मैंने तारों को देखा बहुत दूर
जितना मैं उनसे
वे दिखे इस पल में
टिमटिमाते अतीत के पल
अँधेरे की असीमता में,
सुबह का पीछा करती रात में
यह तीसरा पहर

और मैं तय नहीं कर पाता
क्या मैं जी रहा हूँ जीवन पहली बार,
या इसे भूलकर जीते हुए दोहराए जा रहा हूँ
सांस के पहले ही पल को हमेशा 

क्या मछली भी पानी पीती होगी
या सूरज को भी लगती होगी गरमी
क्या रोशनी को भी कभी दिखता होगा अंधकार
क्या बारिश भी हमेशा भीग जाती होगी,
मेरी तरह क्या सपने भी करते होंगे सवाल नींद के बारे में

दूर दूर बहुत दूर चला आया मैं
जब मैंने देखा तारों को - देखा बहुत पास,
आज बारिश होती रही दिनभर
और शब्द धुलते रहे तुम्हारे चेहरे से

 


(रेत का पुल, 2012)

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Comments (13)

celina

the poem is very lovely and very touching . i never knew that nature could be this mystic . being an eight grader i may not know much about great poetry, but according to my view this is truly a great piece of art.we should give a big clap for Mohan Rana. this guy surely deserves a Grammy award .don’t you think the same uh!!!!!

ANGELINE BALUCOS

its nice to read it can relate to our future

Tari

Wow!!! This is awesoeme

rie.leah.ashmi

awesome and very touching poem

Saiya

this is an awesome poem

aradhya

i love this poem

Candacia

Very nice. It’s lovely!

Abdirahman Ahmed

Good job man, much respect!

Jailson Pereira

Brilliant poem, i loved it!

Gulbash Gulzameenvi

really amazing poem ..... 

Latika Singh

I really love this poem. So far. All of Mohan Rana’s poems are fantastic.

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