Poems

धोबी

चमकती हुई धूप सुबह की
चीरती घने बादलों को चुपचाप
देखते भूल गया मैं आकाश को
दुखते हुए हाथ को,
पानी में डबडबाते प्रतिबिम्ब की सलवटें देखते
मैं भूल गया
अपनी उम्र को,
झूमती हुई हरियाली में लहुलुहान छायाओं को देखते
भूल गया मृतकों के वर्तमान को
जो सोचा करने लगा कुछ और,
घोलता नीले आकाश में बादलों के झाबे को
मैं धो रहा हूँ अपने को

 

 

(धूप के अँधेरे में, 2008)

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Comments (1)

PREMNARAYAN NATH

Excellent translation indeed! The fidelity to the original is kept at optimum level, which is encouraging to the original poet and praiseworthy to the translator.

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