Poems

साधारण कमीज़

दोपहर और शाम के बीच
आता है एक अंतराल
जब थक चुकी होती हैं
आवाजें क्रियाएँ

जैसे अब
समाप्त हो गई सभी इच्छाएँ,
बैठ जाता हूँ किसी भी
खाली कुर्सी पर

पीली कमीज़ पहने
एक लड़का अभी गुजरा
मुझे याद आई
अपनी कमीज़
उन साधारण से दिनों में

यह संभव था
हाँ यह जीवन संभव था
मैं पहने हूँ अब भी
वैसी ही कमीज़

 

 

(जगह,1994)

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